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बिहार में वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे को रफ्तार, चौथे पैकेज के लिए केंद्र ने मांगा नया प्रस्ताव

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रोहतास- कैमूर से गुजरने वाले एक्सप्रेसवे फेज पर बढ़ी हलचल, 4 जिलों में बदलेगी कनेक्टिविटी की तस्वीर।

पटना/आलम की खबर:बिहार की सड़क कनेक्टिविटी को नया आयाम देने वाली वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है। इस महत्वाकांक्षी एक्सप्रेसवे के चौथे पैकेज को लेकर केंद्र सरकार ने नए सिरे से विस्तृत प्रस्ताव मांगा है, जिसके बाद यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि परियोजना को तकनीकी और वित्तीय स्तर पर अधिक व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। बिहार के लिहाज से यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि यह एक्सप्रेसवे राज्य के चार महत्वपूर्ण जिलों—रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद और गया—से होकर गुजरने वाला है और इसके पूरा होने के बाद प्रदेश की सड़क संपर्क व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

यह एक्सप्रेसवे केवल एक सड़क परियोजना भर नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की आर्थिक, औद्योगिक और लॉजिस्टिक संरचना को मजबूत करने वाली बड़ी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। वाराणसी से शुरू होकर झारखंड के रास्ते कोलकाता तक जाने वाला यह कॉरिडोर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के बीच तेज और सुगम संपर्क स्थापित करेगा। ऐसे में बिहार के हिस्से में आने वाले पैकेजों की प्रगति पर विशेष नजर रखी जा रही है।

चौथे पैकेज पर केंद्र की नई कवायद

सूत्रों के अनुसार, परियोजना के चौथे पैकेज को अंतिम मंजूरी की दिशा में आगे बढ़ाने से पहले केंद्र ने एक बार फिर विस्तृत प्रस्ताव मांगा है। इस प्रस्ताव में केवल निर्माण लागत ही नहीं, बल्कि सड़क बनने के बाद उसके संचालन और रखरखाव यानी ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस से जुड़ी दरों और व्यवस्थाओं का भी स्पष्ट ब्यौरा मांगा गया है। इसका मतलब यह है कि सरकार अब सड़क बनाकर छोड़ देने के बजाय उसकी दीर्घकालिक गुणवत्ता और उपयोगिता को भी समान महत्व देना चाहती है।

बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर निर्माण के बाद मेंटेनेंस की कमजोरी सामने आती रही है। यही वजह है कि अब इस एक्सप्रेसवे के लिए शुरुआती चरण में ही यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि सड़क शुरू होने के बाद उसकी हालत लंबे समय तक बेहतर बनी रहे। यही कारण है कि चौथे पैकेज को लेकर तकनीकी और वित्तीय आकलन को ज्यादा विस्तार से मांगा गया है।

PPPAC मंजूरी से पहले होगी पूरी वित्तीय और तकनीकी जांच

जानकारी के मुताबिक, चौथे पैकेज को अंतिम हरी झंडी मिलने से पहले इसे आर्थिक कार्य विभाग के अधीन गठित पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एप्रेजल कमेटी यानी PPPAC के समक्ष रखा जाएगा। यह समिति बड़े सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाले प्रोजेक्ट्स की व्यवहार्यता, लागत, निवेश मॉडल और दीर्घकालिक संचालन क्षमता का परीक्षण करती है। इसलिए नए प्रस्ताव की मांग को इस परियोजना की गंभीरता और उसके बड़े वित्तीय दायरे के रूप में भी देखा जा रहा है।

अगर प्रस्ताव में निर्माण, संचालन, लागत और मेंटेनेंस की शर्तें संतोषजनक पाई जाती हैं, तो इस पैकेज को मंजूरी मिलने की राह आसान हो सकती है। यही वह चरण है, जो आगे चलकर परियोजना की रफ्तार तय करेगा।

बिहार में चौथे फेज का फोकस रोहतास और कैमूर पर

परियोजना के चौथे पैकेज की चर्चा बिहार के रोहतास और कैमूर जिलों के संदर्भ में खास तौर पर हो रही है। जानकारी के अनुसार, इस हिस्से की लंबाई करीब 41 किलोमीटर बताई जा रही है और यह खंड इन दोनों जिलों के भीतर सड़क संपर्क को नई दिशा दे सकता है। यह क्षेत्र भौगोलिक और परिवहन दृष्टि से काफी अहम माना जाता है, क्योंकि यहां से गुजरने वाली आधुनिक हाई-स्पीड सड़क भविष्य में माल ढुलाई, निजी यात्रा और क्षेत्रीय व्यापार—तीनों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

रोहतास और कैमूर पहले से ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में एक्सप्रेसवे का इन जिलों से गुजरना स्थानीय अर्थव्यवस्था, जमीन की उपयोगिता, ट्रांसपोर्ट बिजनेस और आसपास के कस्बों की गतिविधियों पर सकारात्मक असर डाल सकता है। लंबे समय में यह निवेश और औद्योगिक अवसरों को भी बढ़ावा दे सकता है।

हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर बनेगा अहम पैकेज

चौथे पैकेज के निर्माण के लिए जिस मॉडल पर काम प्रस्तावित है, वह हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) बताया जा रहा है। इस मॉडल की खासियत यह है कि इसमें निर्माण एजेंसी और सरकार दोनों की वित्तीय भागीदारी होती है। इससे परियोजना के जोखिम का बोझ पूरी तरह किसी एक पक्ष पर नहीं रहता और प्रोजेक्ट को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।

इस तरह के मॉडल का फायदा यह होता है कि सड़क निर्माण एजेंसी को केवल निर्माण तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि उसे परियोजना की गुणवत्ता और दीर्घकालिक प्रदर्शन से भी जोड़ा जाता है। इससे उम्मीद की जाती है कि सड़क केवल समय पर बने ही नहीं, बल्कि बेहतर मानकों के साथ लंबे समय तक टिकाऊ भी रहे।

बिहार के चार जिलों को मिलेगा सीधा लाभ

वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे का बिहार हिस्सा राज्य के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बिहार में इसकी कुल लंबाई करीब 159 किलोमीटर के आसपास रहने वाली है और यह रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद तथा गया जिलों से होकर गुजरेगा। यानी यह परियोजना केवल एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से की व्यापक कनेक्टिविटी को प्रभावित करेगी।

इन जिलों के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लंबी दूरी की यात्रा, माल परिवहन और दूसरे राज्यों से संपर्क अधिक तेज और सुगम हो जाएगा। एक्सप्रेसवे बनने के बाद ट्रैवल टाइम कम होने, ईंधन की बचत होने और ट्रांसपोर्ट लागत घटने की संभावना जताई जा रही है। इससे आम यात्रियों से लेकर ट्रांसपोर्ट कारोबारियों तक को लाभ मिल सकता है।

रोहतास में निर्माण की हलचल, कैमूर में भी बढ़ी गतिविधि

सूत्रों के मुताबिक, बिहार में इस परियोजना के कुछ हिस्सों पर जमीन स्तर पर गतिविधियां पहले ही शुरू हो चुकी हैं। खासकर रोहतास जिले में निर्माण कार्य को लेकर हलचल देखी जा रही है, जबकि कैमूर क्षेत्र में भी तैयारी और प्रारंभिक काम आगे बढ़ने की जानकारी सामने आ रही है। इससे यह संकेत मिलते हैं कि परियोजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि चरणबद्ध रूप से जमीन पर उतर रही है।

हालांकि, इस तरह की बड़ी परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी, तकनीकी स्वीकृति और वित्तीय प्रक्रियाएं अक्सर समय लेती हैं। ऐसे में जहां काम शुरू हुआ है, वहां उसकी गति बनाए रखना और बाकी हिस्सों को भी समय पर जोड़ना सरकार और एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती होगी।

13 फेज में बनेगा पूरा एक्सप्रेसवे

वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे को एक विशाल बहु-चरणीय परियोजना के रूप में विकसित किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, इसे कुल 13 फेज में पूरा करने की योजना है। इससे यह साफ है कि परियोजना का आकार और दायरा काफी बड़ा है, और इसे एक ही बार में नहीं बल्कि हिस्सों में विकसित किया जा रहा है ताकि तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन बेहतर तरीके से हो सके।

जब कोई एक्सप्रेसवे इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र से गुजरता है, तो उसके हर पैकेज की अपनी अलग चुनौतियां होती हैं—कहीं भूमि अधिग्रहण, कहीं पुल-पुलिया, कहीं पर्यावरणीय मंजूरी, तो कहीं वित्तीय मॉडल। ऐसे में 13 फेज की संरचना इस परियोजना को व्यवस्थित रूप से पूरा करने की रणनीति मानी जा रही है।

करीब 610 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बदलेगा पूर्वी भारत का ट्रैवल मैप

पूरी परियोजना की लंबाई लगभग 610 किलोमीटर बताई जा रही है। यह सिक्स-लेन एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के वाराणसी से निकलकर बिहार और झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल के कोलकाता तक जाएगा। इस रूट को केवल शहरों को जोड़ने वाली सड़क के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक गलियारे के रूप में देखा जा रहा है, जो माल ढुलाई, व्यापार, उद्योग और इंटर-स्टेट कनेक्टिविटी के लिहाज से बेहद अहम साबित हो सकता है।

पूर्वी भारत में लंबे समय से तेज, आधुनिक और निरंतर हाई-स्पीड सड़क नेटवर्क की जरूरत महसूस की जाती रही है। यह एक्सप्रेसवे उसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। बिहार के लिए यह परियोजना विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राज्य के कई हिस्सों को राष्ट्रीय स्तर के सड़क नेटवर्क से बेहतर ढंग से जोड़ने का मौका मिलेगा।

2027 तक पूरा करने का लक्ष्य, लेकिन नजर प्रगति पर

परियोजना को वर्ष 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया जा रहा है। हालांकि इस तरह के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में समय-सीमा अक्सर कागजी लक्ष्य से आगे खिसक जाती है, इसलिए असली तस्वीर निर्माण की गति, मंजूरी प्रक्रिया और जमीनी प्रगति से ही साफ होगी। फिलहाल चौथे पैकेज पर नए प्रस्ताव की मांग को इस परियोजना की प्रगति का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

अगर आने वाले महीनों में मंजूरी और निर्माण दोनों मोर्चों पर तेजी आती है, तो बिहार के हिस्से में यह परियोजना सड़क इतिहास का बड़ा अध्याय साबित हो सकती है। आने वाले समय में यह सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि व्यापार, रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय विकास की दिशा भी बदल सकती है।

बिहार के लिए क्यों अहम है यह एक्सप्रेसवे?

इस परियोजना का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह बिहार को केवल उत्तर प्रदेश और झारखंड से नहीं, बल्कि पूर्वी भारत के एक बड़े आर्थिक कॉरिडोर से जोड़ने जा रही है। इससे राज्य के कई जिलों में लॉजिस्टिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, उद्योगों के लिए परिवहन लागत कम हो सकती है और क्षेत्रीय विकास को नई रफ्तार मिल सकती है। यही वजह है कि वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे को बिहार की भविष्य की कनेक्टिविटी का बड़ा आधार माना जा रहा है।

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